आयुर्वेद

पित्त दोष के गुण, कर्म, मुख्य स्थान, प्रकार, असंतुलन, बढ़ने और कम होने के लक्षण

पित्त शरीर का ऐसा भाव(दोष) है जो शरीर की गर्मी, आग और ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। जैविक रूप से,...

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वात दोष के गुण, कर्म, मुख्य स्थान, प्रकार, असंतुलन, बढ़ने और कम होने के लक्षण

"वा गतिगंधनयो" धातु से वात अर्थात वायु शब्द निष्पति होती है।  वात एक अभिव्यक्ति है और मुख्य कार्यकारी शक्ति है...

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आयुर्वेद के त्रिसूत्र

हेतुलिँगौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम्। त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः।। आयुर्वेद में चिकित्सा के तीन अंग - हेतु, लिंग, और औषध माने...

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