वटी गुटिका

अग्निवर्द्धक बटी (Agni Vardhak Vati)

अग्निवर्द्धक वटी (Agni Vardhak Vati) पाचक अग्नि की वृद्धि करती है और भूख लगाती है। यह उन रोगियों के लिए लाभदायक है जिन को भूख नहीं लगती या पाचक रसों का उचित स्राव नहीं होता। पाचक रसों का उचित स्राव न होने से रोगी को खाना खाने के बाद पेट में भारीपन रहता है और डकार आते रहते है। यह उन रोगियों के लिए तो अमृत के समान काम करती है। इसके अलावा यह खुलकर दस्त लाती है और मंदाग्नि, अरुचि, भूख ना लगना, पेट फूलना, पेट से आवाजें आना, दस्त-कब्ज, खट्टी डकारें आदि दोषों को दूर करती है और साथ ही भूख को बढ़ाती है।

Contents

घटक द्रव्य एवं निर्माण विधि

काला नमक 1 भाग
नौसादर 1 भाग
गोल मिर्च 1 भाग
आक के फूलों की लौंग 1 भाग
नीम्बू का सत्त 64 भाग
नीम्बू रस भावनार्थ

आक के फूलों की लौंग: आक के फूलों के अंदर जो चौकोर भाग होता है, उसको आक के फूलों की लौंग कहते हैं।

निर्माण विधि

अग्निवर्द्धक वटी का निर्माण करने के लिए सामान मात्रा में काला नमक, नौसादर, गोल मिर्च और आक के फूलों की लौंग लें और कूटकर, कपडे से छानकर चूर्ण बना लें।

इसके बाद इस चूर्ण में इसके कुल वजन का सोलहवां भाग नीम्बू का सत्त मिलायें। फिर इस सामग्री को अच्छी तरह मिलायें और नीम्बू रस के रस में गोटें। इसकी चने के बराबर गोलियां बना लें। इन गोलियों को धुप में सुखायें।

औषधीय कर्म

अग्निवर्द्धक वटी (Agni Vardhak Vati) में निम्नलिखित औषधीय गुण है:

  1. क्षुधावर्धक – भूख बढ़ाने वाला
  2. अग्नि वर्धक
  3. पाचन – पाचन शक्ति बढाने वाली
  4. अनुलोमन – उदर से मल और गैस को बाहर निकालने वाला
  5. दीपन – जठराग्नि को प्रदिप्त करता है

चिकित्सकीय संकेत (Indications)

अग्निवर्द्धक वटी (Agni Vardhak Vati) निम्नलिखित व्याधियों में लाभकारी है:

  1. मंदाग्नि
  2. अरुचि
  3. भूख ना लगना
  4. पेट फूलना
  5. पेट से आवाजें आना
  6. दस्त-कब्ज (पाचन क्रिया के विकृत होने के कारण)
  7. खट्टी डकारें
  8. मुँह का खराब स्वाद

अग्निवर्द्धक वटी के लाभ एवं प्रयोग

अग्निवर्द्धक वटी (Agni Vardhak Vati) बहुत ही स्वादिष्ट है और इसके मुँह में रखते ही मुँह का खराब स्वाद ठीक हो जाता है। यह पाचक रस को बनाती है जिससे भूख लगती है और खुलकर दस्त आता है।

मंदाग्नि, अरुचि, भूख ना लगना

जिन रोगियों को कम भूख लगने की शिकायत हो, उन के लिए यह गोली बहुत फायदेमंद है। यह गोली मंदाग्नि, अरुचि, भूख ना लगना आदि दोषों को दूर करती है और साथ ही भूख को बढ़ाती है।

अजीर्ण

यदि कोई व्यक्ति लम्बे समय से अजीर्ण का रोगी हो तो उसका पित्त कमजोर हो जाता है और कफ (Kapha) और आंव बढ़ जाता है। इस वजह से उसके शरीर में कई लक्षण दिखाई देते हैं जैसे:

  1. ह्रदय और पेट में भारीपन
  2. शरीर में आलस
  3. किसी काम में मन ना लगना
  4. ह्रदय और नाड़ी की गति मंद पड़ना आदि

इन सभी स्थितियों में अग्निवर्द्धक वटी का उपयोग करने से बहुत लाभ मिलता है। यह गोली पित्त को जगा देती है, कफ और आंव के दोष को पचाकर बाहर निकालती है और पाचक रस बनाकर भूख बढ़ा देती है।

अफारा

पेट फूलना, पेट से आवाजें आना, दस्त-कब्ज आदि हो तो अग्निवर्द्धक वटी लाभकारी सिद्ध होती है। अफारा के उपचार के लिए उत्तम औषधि है।

पेट दर्द

यदि किसी के पेट में तेज दर्द हो तो इस औषधि की दो गोलियां गरम पानी के साथ लेने से तुरंत आराम मिलता है।

मात्रा एवं सेवन विधि (Dosage)

अग्निवर्द्धक वटी (Agni Vardhak Vati) की सामान्य औषधीय मात्रा  व खुराक इस प्रकार है:

औषधीय मात्रा (Dosage)

बच्चे ½ गोली
वयस्क 1 गोली

सेवन विधि

दवा लेने का उचित समय (कब लें?) भूख कम लगने पर खाना खाने के कुच्छ समह पहिले लें। पाचन क्रिया को उत्तम बनाने के लिए अग्निवर्द्धक वटी को खाना खाने के बाद लें
दिन में कितनी बार लें? 3 बार – सुबह, दोपहर और शाम
अनुपान (किस के साथ लें?) गुनगुने पानी के साथ लें या मुँह में डाल कर चूसें।
उपचार की अवधि (कितने समय तक लें) 3 से 7 दिन या चिकित्सक की सलाह लें

आप के स्वास्थ्य अनुकूल अग्निवर्द्धक वटी की उचित मात्रा के लिए आप अपने चिकित्सक की सलाह लें।

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